Wednesday, May 28, 2014

मैंने कभी ट्रेंड फॉलो नहीं किया: सनी देओल

घायल रिटर्न्स को खुद डायरेक्ट करने का फैसला आपने क्यों किया? पहले इसे अश्विनी चौधरी  निर्देशित करने वाले थे.
हां, एक-दो डायरेक्टर से बात चल रही थी, लेकिन इवेंचुअली, मुझे ये पिक्चर बनानी थी, बीकॉज दिस इज सम कैरेक्टर व्हिच आई ऑलवेज वॉन्टेड टू डू. देन आई डिसाइडेड टू डू मायसेल्फ. और काफी टाइम से मैं डायरेक्शन भी करना चाहता था. मुझे ये कैरेक्टर बहुत पसंद है, तो मैंने सोचा कि क्यों न इसी से शुरू करूं. फिलहाल, मैंने अपने सभी प्रोजेक्ट्स आगे कर दिया हैं. यही मेरी प्राथमिकता है.

दिल्लगी और घायल रिटर्न्स के बीच काफी लंबा वक्त गुजर गया. इस दौरान आपने डायरेक्शन को मिस किया?
ऐसे तो कुछ मिस-विस की बात नहीं होती है. लेकिन सबसे ज्यादा मजा एक्टिंग में ही आता है. डायरेक्शन में एक अलग संतुष्टि होती है, क्योंकि आप जो कहना चाहते हैं, वह कह सकते हैं. फिल्म में जो कुछ भी आप बताओगे, वह सब आपके दिमाग से ही निकला हुआ है. आपने हां की होगी. वह क्रिएटिव सैटिस्फैक्शन अलग ही होता है. डेफिनेटली, पूरा वक्त चला जाता है. मेरा बहुत टाइम जा रहा है घायल रिटर्न्स में, लेकिन अगर टाइम नहीं लगेगा, तो अच्छी चीज बनेगी नहीं.

घायल रिटर्न्स में आप एक्ट भी कर रहे हैं. एक साथ दो जिम्मेदारियों का निबाह करना मुश्किल नहीं होगा?
मैं पहले दिल्लगी में एक्ट और डायरेक्ट कर चुका हूं. मेरे लिए यह कोई नई चीज नहीं है. एव्रीथिंच्च् यू डू इन द लाइफ इज ए चैलेंज. और चैलेंज तो वह लोगों के लिए हो जाता है, लेकिन आप तो उसे कर रहे होते हैं, क्योंकि आप करना चाहते हो. इसमें पहला या दूसरा आना है, उसकी रेस तो नहीं है. जब आप एक्ट और डायरेक्ट करते हैं, तो अलग बात होती है, लेकिन जैसे कि मैंने बताया कि मैं पहले भी यह काम कर चुका हूं. तो उसकी ओर इतना गौर नहीं करता हूं कि ये कैसे करूंगा और वो कैसे करूंगा.

बतौर एक्टर आप जो प्रोजेक्ट्स चुन रहे हैं, वह सब आपकी इमेज और दर्शकों की पसंद के हिसाब से हैं, लेकिन क्या वजह है कि वह बॉक्स-ऑफिस पर नहीं चल रहे हैं?
जी अगर मुझे पता होता कि किस चीज पर कैसा रिस्पॉन्स मिलेगा, तो मैं हर चीज सही ही करता ना (मुस्कुराते हैं). उसके बारे में कुछ कह नहीं सकते. कोई चीज चलती है और वह इतनी बकवास होती है कि फिर हम उसके बारे में भी कुछ कह नहीं सकते. तो चलना-ना चलना इज नॉट इन आवर हैंड. जबसे इंडस्ट्री है, तबसे हम लोग यही बातें कर रहे हैं. लेकिन इसका कोई पक्का जवाब नहीं मिला है. सब कुछ स्पेक्युलेशन पर चल रहा है. आज किसी को बोल दो कि यह ठीक है, पता चलता है कि कल वही ठीक नहीं होता. उस वक्त कोई ऐसी चीज ठीक होगी, जिसके बारे में आपने कभी सोचा भी नहीं था. उस वक्त फिर सब कहते हैं कि हां, मुझे पता था. आई थिंक इट्स ऑल मैटर ऑफ पर्सनल चॉइस. हर चीज का अपना एक वक्त होता है और हर चीज का अपना लाइक और डिस्लाइक्स होते हैं. चलना-न चलना बॉक्स ऑफिस पर, इतने साल तक तो मेरे लिए कभी मायने नहीं रखा. बेशक यह बहुत महत्वपूर्ण है, तभी आपको प्रोजेक्ट्स कर पाते हैं. इतना तो मुझे यकीन है कि जहां पर भी हम जाते हैं, लोग हमें बहुत प्यार करते हैं. दैट इज बिकॉज ऑफ वर्क और तो हमने कुछ किया नहीं है.

आप ट्रेंड को फॉलो करने में बिलीव करते हैं?
ट्रेंड क्या है? आज कोई चलेगा, तो वह ट्रेंड बन जाएगा. सब वही करने लगते हैं. कल कुछ और चलता है, तो वह ट्रेंड बन जाता है. वो चीजें मैंने कभी फॉलो नहीं की. हां, एक-दो प्रोजेक्ट्स होंगे, जिन्हें मैंने किया है, क्योंकि लोगों ने कहा कि इस जॉनर की पिक्चर चलेगी, तो मैंने कर ली. मैंने जब भी सफलता पाई है, इट हैज ऑलवेज बीन सब्जेक्ट, विद फिल्म्स, जो उस जमाने के नहीं थे और उस वक्त वैसी फिल्में नहीं चलती थीं, उनका ट्रेंड नहीं था. सो इट इज नॉट सेटिंग ट्रेंड ऑर डूइंग एनिथिंग,  बेसिकली डूइंग व्हाट यू एंजॉय डूइंग. आपको अपने काम में मजा आ रहा है, तो फिर वही आपकी सेटिस्फैक्शन है.

टीवी पर कॉमेडी शोज आप देखते हैं? क्या लोग आपके सामने भी आपकी मिमिक्री करते हैं?
जब कभी-कभार मैं इन शोज पर जाता हूं, तो देख लेता हूं. वैसे नहीं देखता हूं. हां, मेरे सामने भी लोग मेरी मिमिक्री करते हैं और बताते हैं कि वो कितना अच्छा कर लेते हैं. तो जब मैं उनको बोलते हुए सुनता हूं, तो सोचता हूं कि क्या वाकई में मैं ऐसा हूं या नहीं हूं (हंसते हैं). मैं खुद से सवाल करने लग जाता हूं. ऑबवियसली मैं उसे एंजॉय करता हूं. पहली बार जब देखा, तब अच्छा नहीं लगता था, क्योंकि कोई नहीं चाहता कि उसकी कोई मिमिक्री करे. लेकिन बाद में इट बिकम्स योर पार्ट ऑफ लाइफ. आपको दिखता भी है कि वह इसे करते हुए एंजॉय करता है, इसलिए कर रहा है. अगर वह इसे करना एंजॉय नहीं करता, तो क्यों करता? मैंने कभी पिन पॉइंट किया नहीं कि कौन मेरी मिमक्री अच्छी करता है.

आपको यह आपत्तिजनक लगता है?
देखिए, हर आदमी जो भी अपने प्रोफेशन में है, जो भी वह करता है, उसकी वजह होती है. और इसमें भी टैलेंट होता है. ऐसे नहीं होता यह. मेरे अंदर मिमक्री का टैलेंट नहीं है, लेकिन मैं अपनी कहानी के अंदर ओरिजिनैलिटी लाने में लगा रहता हूं.

सरदारों पर सबसे ज्यादा जोक बनाए जाते हैं. उसको आप कैसे देखते हैं?
वी आर एक्टर्स बैसिकली, इसलिए इन चीजों पर मैं गौर नहीं करता. लेकिन इतना कहूंगा कि कोई भी धर्म हो, कौम हो, कहीं की भी हो, उस पर कोई चीज पर्सनल नहीं कहनी चाहिए. क्योंकि हर्ट करती है. उसके अलावा, हम अपना मजाक उड़ाते रहते हैं, तो उस चीज की कोई फिक्र नहीं है. उसकी परवाह नहीं है. क्योंकि उससे ना कोई आदमी बनता है और ना ही बिगड़ता है.

नए डायरेक्टर्स में किसका काम आपको अच्छा लगता है?
अच्छे डायरेक्टर्स हैं. मुझे नाम याद नहीं रहते. मैंने उड़ान देखी थी विक्रमादित्य मोटवानी की. वह मुझे अच्छी लगी थी. कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी थी... सुजॉय घोष. इस ढंग के डायरेक्टर्स अच्छे लगते हैं, जिन्होंने कहानी को समझा हो और आएम श्योर उसको काफी वक्त दिया होगा, तभी ऐसी कहानियां बनती हैं.

इस तरह का काम देखकर आपके अंदर के निर्देशक को चुनौती महसूस होती है?
देखिए, जो फॉर्मूला फिल्म्स बना सकता है, वह वही बना सकता है. उसके लिए भी एक काबिलियत चाहिए होती है. उसका अपना बिलीफ होता है, जिसे आप सब लाइक करते हैं. इट इज एंटरटेनमेंट. कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जिसमें कैरेक्टर में डेप्थ होती है. जिसे आप देखना एंजॉय करते हैं. आप अपनी या दुनिया में जो देख रहे होते हैं, उसकी एक झलक मिलती है. ये नहीं है कि वो बेहतर हैं और ये बेहतर नहीं हैं. हर चीज में आदमी अपनी कैपसिटी के हिसाब से चलता है. बस यही है कि जब एक आदमी जो कर पाता है, वह उसे करता है, तो लगता है कि वह बहुत आसान है. दूसरा आदमी भी उस ढंग की फिल्में बनाने लग जाता है. वह गलत चीज है. अगर कोई चीज चलती है, तो सब वही बनाने लगते हैं. वह गलत है. आपको वह करना चाहिए, जो आपको अच्छा लगता है और जो आपका बिलीफ है. नॉट बिकॉज वह आपको लगता है कि सक्सेज होगा. 

नए कलाकारों में किसका काम आपको अच्छा लग रहा है?
सब अभी यंग हैं, अभी काम कर रहे हैं, उनको अभी मैच्योर होना है, दे हैव लॉट टू लर्न एंड ये आ जाते हैं, तो एक टेस्ट शुरू हो जाता है कि आप हर साल किस ढंग से आप अपने आपको आगे लेकर जाओगे, क्या क्या करोगे, तो कुछ कह नहीं सकता. मैंने किसी का काम ज्यादा देखा नहीं है. मैं फिल्में ज्यादा देखता नहीं हूं. लेकिन डेफिनेटिली आई हैव सीन चिंटूज सन रणबीर्स फिल्म्स. एक फिल्म देखी थी, वह अच्छी लगी थी. बाकी एक्टर्स की झलक देख लेता हूं कभी टीवी पर या कभी यू ट्यूब पर. अच्छे हैं सब. उन्हें देखकर लगता है कि जब मैं यंग था, तो मुझमें भी ऐसा ही कॉन्फिडेंस था. बट डेफिनेटिली दे ऑल आर मेच्योरिंग अप. गिव देम सम कपल ऑफ ईयर्स...

नए अभिनेताओं में से किस पर आपका डायलॉग ढाई किलो का हाथ फिट होगा?
देखिए, जब मुझे ये डायलॉग दिया गया था, तो मुझे भी नहीं पता था कि ये मुझ पर फिट होगा या नहीं. उस वक्त भी सब एक्टरों की पहचान थी, जब मैं था तब. एक एक्टर को वही करना चाहिए, जो उनकी पर्सनैलिटी कहती है. जरूरी नहीं है कि जिस ढंग से मैं डायलॉग बोलता हूं, वही एक तरीका है. दैट्स नॉट द राइट वे. ऑबवियसली, वह मुझे सूट करता है, तो पब्लिक को वह बात सही लगती है. मजा क्या है कि अगर आप भी वही डायलॉग बोलो, जो दूसरा कोई बोलता है. क्यों एंजॉय करेगी पब्किल? अनलेस एंड अनटिल आएम ए मिमक्री आर्टिस्ट (हाहाहा).

धरम जी और आपके बीच किस तरह का संबंध रहा है? आजकल पापा और बेटे के बीच दोस्त का रिश्ता होता है
देखिए, अगर आप गिने-चुने परिवारों की बात कर रहे हैं, जहां इस ढंग के रिश्ते होते हैं. पूरा देश तो ऐसा नहीं है. जहां भी हम जाते हैं, देखते हैं कि लोग हमारी तरह ही हैं. कुछ अलग चीज नहीं है उनमें. जहां उन्हें लगता है कि ये बाप की इज्जत नहीं कर रहा है, तो उन्हें अजीब सा लगता है. उन्हें लगता है कि यह हमारे जैसे ही हैं.

अपने बेटे करण के साथ आपने दोस्त का रिश्ता बनाया है?
देखिए, कोई रिश्ता रखता नहीं है. ये रिश्ते अपने आप डेवलप होते हैं. कुदरती बन जाते हैं. कोई जबरदस्ती नहीं करता है कि बेटे के संग ऐसा रिश्ता रखें. हमारी एक फैमिली है, जो सालों से एक ढंग से जी रही है. और हम सब अपने रहन-सहन से खुश हैं. दैट्स व्हाट इट इज. इसमें कोई साइंटफिक चीज नहीं है.

सुना है कि आपके घर के दरवाजे पंजाब से आने वाले हर इंसान के लिए खुले रहते हैं?
ऐसा नहीं है. बेसिकली, वी आर वेरी ओपन हार्टेड पीपुल. अगर किसी को जरूरत होती है और हम कुछ मदद कर सकते हैं, तो हम आगे बढक़र करते हैं. और खाने-पीने से तो किसी को क्या इंकार करना. किसी को भी इंकार नहीं करना चाहिए. आप पंजाब में किसी के घर चले जाओ, वह आपको खिलाएंगे-पिलाएंगे. यह नॉर्मल है. इसको हम लोग क्यों नॉर्मल नहीं समझते, मुझे समझ में नहीं आता. सबको पता है कि हम किस ढंग के हैं. 

आज सभी स्टार्स ट्विटर पर हैं, लेकिन आप क्यों नहीं हैं?
मैं वहां क्या बोलूंगा कि अभी मैंने खाना खाया है, अब मैं उठा हूं और अब वहां जा रहा हूं (हंसते हैं). मैं अपना काम छोडक़र क्या यह सब करने में लगा रहूं. सफाई देता रहूं कि मैं गलत नहीं हूं, अगर कोई कुछ छाप दे तो. अगर आपको लगता है कि मैं गलत हूं, तो ठीक है. आप अच्छे हो, 120 करोड़ लोगों का आपके पास है डाटा? व्हाई वी आर वेस्टिंग आवर टाइम इन ऑल दिस. आपको जानें लोग तो आपके काम से जानें, आपके व्यवहार से जानें, जरूरी नहीं है कि आपको उसे एक झंडा बनाके पूरे देश में आप उसे लेकर चलें. वी होंट बिलीव इन ऑल दीज थिंगस. वी आर एक्टर्स, वी बीकम्स स्टार्स बीकॉज पिक्चर चल जाती है. पर बेसिकली, वी आर एक्टर्स.

आपके बेटे करण की कैसी तैयारी चल रही है?
जब आप तय करते हो कि आपको इस फील्ड में जाना है, तो आप उस हिसाब से तैयारी करते हो. मैंने अपने हिसाब से तैयारी की थी. करण को क्या करना है, क्या बनना है, वह अपनी तैयारी कर रहा है. ये नहीं है कि वह बॉडी बिल्डिंग कर रहा है, वह डासिंग सीख रहा है. हां, एज एन एक्टर, यू हैव टू बी फ्लेक्सिब इन एव्री थिंग. आप जितनी अधिक चीजें जान लोगे, अच्छा है. पता नहीं कब उसका इस्तेमाल आप कर सकोगे. नॉलेज एक एक्टर की एैसेट्स होती है.

कब तक घोषणा करेंगे कि करण किस फिल्म से डेब्यू करेंगे?
मैंने तय किया है कि मैं तब तक किसी चीज के बारे में बात नहीं करूंगा, जब तक वह चीज शुरू नहीं हो जाएगी. क्योंकि फिर बातें ही बातें रह जाती हैं और फिर लोग पूछना शुरू कर देते हैं कि आपने ये कहा था, उसका क्या हुआ. एनर्जी उसके ऊपर वेस्ट होती है. हां यार, मुझसे गलती हो गई, सॉरी यार. उस वक्त मुझे लगा था कि मैं वो करूंगा, तो कह दिया. यह मैंने समय के साथ सीखा है कि चुप रहो. उतना ही बोलो, जितना आप कर रहे हो.

एक्टिंग फ्रंट पर क्या है?
दो-तीन प्रोजेक्ट्स हैं. लेकिन उनके बारे में अभी बात नहीं करना चाहता, क्योंकि फिर लोग कहेंगे कि वह पुश हो गई, वह रिलीज नहीं हो रही. लोगों को तो मसाला चाहिए. उसके बिना किसी को मजा नहीं आता. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं तो काम कर रहा हूं. लेकिन जिस आदमी ने इतने पैसे लगाए हैं, उसका सत्यानाश क्यों कर रहे हैं. तो उस हिसाब से सोचना चाहिए. मुझ पर हार्म करना है, तो सीधा कीजिए. क्यों किसी को डैमेज करना, आई डोंट थिंक इट्स राइट. क्योंकि मेरा तो पैसा नहीं लगा ना. जिसका भी लगा, उसका क्यों नुकसान करना, आपको क्या हक है. आपके बारे में कोई ऐसा कुछ कहे कि आपके बिजनेस को ठेंस लगे, तो आई थिंक दैट्स बीइंग क्रिमिनली रॉन्ग. अगर हमें फर्क पडऩा होता, तो अभी तक हम यहां नहीं होते. अगर मैं कोई पिक्चर प्रोड्यूस करूं, उसमें कोई प्रॉब्लम हो, तो हर चीज में प्रॉब्लम होती है. किसी की लाइफ एकदम स्मूद नहीं है. लेकिन उसी को निपट कर आप आगे बढ़ते हैं, वही लाइफ है. क्यों शोर मचाकर उसे आप निगेटिव-पॉजिटिव-निगेटिव करोगे, तो फाइनेंशियली नुकसान पहुंचेगा प्रोजेक्ट को. उन्हें लगेगा कि सनी की पिक्चर के बारे में ऐसा बोल रहे हैं, तो मैं उसे नहीं लेता हूं, दिक्कत होगी. पैसे की कोई वैल्यू नहीं है, इसका मतलब. इन चीजों को खयाल रखना चाहिए.
- रघुवेंद्र सिंह 



Monday, April 28, 2014

मेरी ख्वाहिश पूरी हो गई- कार्तिक आर्यन

कार्तिक आर्यन से रघुवेन्द्र सिंह यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि शोमैन सुभाष घई का हीरो बनने के बाद एक कलाकार के जीवन में क्या परिवर्तन आता है
प्यार का पंचनामा और आकाशवाणी के बाद कार्तिक आर्यन ने एक लंबी छलांग मारी. वह सीधे शोमैन सुभाष घई की नजर के तारे बन गए. आकाशवाणी का ट्रेलर देखने के बाद सुभाष घई ने तय कर लिया कि उनकी फिल्म कांची का बिंदा कोई और नहीं, केवल कार्तिक ही बनेंगे. कार्तिक जैसे एक नवोदित अभिनेता के लिए यह हर्ष का विषय है. सुभाष घई एक महान फिल्मकार हैं. उनके नायकों की एक शानदार परंपरा रही है. दिलीप कुमार, राजकुमार, अनिल कपूर, शाहरुख खान, ऋतिक रोशन, सलमान खान... मुझे खुशी इस बात की है कि इस गौरवशाली लिस्ट में अब मेरा नाम भी शामिल हो गया है. मैं उनकी फिल्में देखकर बड़ा हुआ हूं. हर कलाकार का सपना होता है कि वह यश चोपड़ा और सुभाष घई के साथ करे. मेरी सुभाष जी के साथ काम करने की ख्वाहिश पूरी हो गई. करियर के आरंभ में ही कांची जैसी एक महिला प्रधान फिल्म चुनना अपने आपमें साहस की बात है. इस फैसले के बारे में कार्तिक कहते हैं, जब सुभाष जी ने मुझसे कहा कि फिल्म का नाम कांची है, तो मेरे मन में सवाल उठा कि इसका टाइटल कांचा क्यों नहीं है (हंसते हैं). उन्होंने मुझे समझाया कि कांची के किरदार को आपका किरदार मजबूत बनाता है. अगर मैं आपके किरदार को स्ट्रॉन्ग नहीं बनाऊंगा, तो फिल्म कमजोर बन जाएगी. वह बात मेरे दिमाग में बैठ गई. मेरा मानना है कि किसी फिल्म में छोटा और स्ट्रॉन्ग रोल करना हमेशा किसी फिल्म में लंबा और बेअसरदार रोल करने से बेहतर होता है.
कार्तिक के लिए कांची एक रोमांचक अनुभव रहा. इस फिल्म ने उन्हें इंडस्ट्री के उन साहसिक फिल्मकारों के साथ काम करने के लिए तैयार कर दिया, जो बिना स्क्रिप्ट के सेट पर काम करने में विश्वास करते हैं. बकौल कार्तिक, सुभाष जी की फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं होती. वह स्पॉनटेनिटी पर यकीन करते हैं. कई बार वह सेट पर मेरे सामने डायलॉग लिखते थे और मुझसे कहते थे कि चलो, इसे बोल दो. इस प्रक्रिया में मुझे शुरू में दिक्कत हुई, लेकिन मैंने एक कलाकार होने के नाते इसे चुनौती की तरह लिया. सुना है कि बहुत सारे फिल्ममेकर बिना स्क्रिप्ट के काम करते हैं. सुभाष जी ने मुझे उस माहौल में काम करने के लिए अभी से तैयार कर दिया है.
इस उपलब्धि और हर्षोल्लास के बीच कार्तिक को अपने भविष्य की फिक्र है. दरअसल, हर फिल्म से एक कलाकार का करियर दांव पर लगा होता है और जब एक कलाकार गैर फिल्मी पृष्ठभूमि से आता है, तो उसे हर कदम फूंक-फूंककर रखना पड़ता है. कांची कार्तिक के करियर को क्या मोड़ देगी, इसके बारे में फिलहाल वह सोचना भी नहीं चाहते. कांची का नसीब जो भी हो... एक्टर के तौर पर मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा हूं. मैं खुश हूं. मैं इक्कीस साल का था, जब मैंने प्यार का पंचनामा शूट कर दी थी. मैं अभी बहुत यंग हूं. इस हिसाब से मेरे पास बहुत टाइम है. हम सबको यह लगता है कि किसी बड़े फिल्मकार की फिल्म का हीरो बनने के बाद एक अभिनेता का जीवन बदल जाता है, मगर हकीकत कुछ और होती है. कार्तिक इन दिनों एक ओर कांची का प्रचार कर रहे हैं, तो दूसरी ओर अगली फिल्म चुनने की कश्मकश में हैं. हर रोज वक्त निकालकर वह लोगों से मिलते हैं और तलाशते हैं कि अगला कदम क्या उठाया जाए. ताज्जुब की बात है कि चॉकलेटी चेहरा होने के बावजूद उन्हें अब तक यशराज फिल्म्स और धर्मा प्रोडक्शंस से फोन नहीं आया. हालांकि उनकी पहली ही फिल्म प्यार का पंचनामा बेहद चर्चित हुई थी. मुझे इसकी वजह पता नहीं. मैं यशराज और धर्मा के हीरो के तौर पर पहचाना जाना चाहता हूं, लेकिन शायद अब तक इन लोगों की मुझ पर नजर नहीं पड़ी है. मैं उस पल का इंतजार कर रहा हूं, जब इन प्रोडक्शन हाउस से मुझे बुलावा आएगा.
कार्तिक ग्वालियर (मध्य प्रदेश) के एक मध्यमवर्गीय परिवार से हैं. उनकी मम्मी (माला तिवारी) और पापा (मुनीश तिवारी) पेशे से डॉक्टर हैं. उनकी इच्छा थी कि कार्तिक भी डॉक्टर बनें, लेकिन कार्तिक के अपने कुछ सपने थे. इन सपनों को पूरा करने के लिए कार्तिक पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. मुंबई की महंगी और मुश्किल भरी जिंदगी का सामना वह अकेले डटकर कर रहे हैं. यहां जीवन जीना बहुत मुश्किल है. मैं अपना खर्च खुद चला रहा हूं. हम सब जानते हैं कि एक न्यूकमर को इंडस्ट्री में कितना मेहनताना मिलता है. जैसे-जैसे आप बड़े एक्टर बनते हैं, आपकी कमाई बढ़ती है, लेकिन आपका खर्च भी दोगुना होता जाता है. एक एक्टर का अच्छा दिखना बहुत जरूरी होता है. उसे अच्छी जगह रहना पड़ता है. यह सब मेंटेन करना कभी-कभी मुश्किल हो जाता है.
इंडस्ट्री इन दिनों पूरी तरह प्रोफेशनल हो चली है. मैनेजर और पब्लिसिस्ट एक एक्टर के प्रोफेशन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं. यह एक एक्टर के करियर को बनाने और संवारने में आजकल महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. लेकिन इनका चुनाव करना अपने आपमें एक बड़ी चुनौती है. खासकर जब आपका मार्गदर्शन करने के लिए कोई न हो. कार्तिक इन चुनौतियों से अकेले जूझ रहे हैं. कभी-कभी उन्हें लगता है कि काश, इस इंडस्ट्री में उनकी जान-पहचान का कोई अनुभवी व्यक्ति होता, तो शायद उनकी राह आसान बन जाती. आप फिल्म इंडस्ट्री के बाहर से आते हैं, तो इस समस्या से आपको जूझना पड़ता है. मुझे कभी-कभी समझ में नहीं आता है कि मैं जो फैसला ले रहा हूं, वह सही साबित होगा या नहीं. मुझे गाइड करने के लिए इस इंडस्ट्री में कोई नहीं है.
कार्तिक भाग्यशाली रहे कि फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखते ही निर्माता कुमार मंगत की कंपनी ने उनके साथ तीन फिल्म का अनुबंध साइन कर लिया. इस साल के अंत तक वह कुमार मंगत की तीसरी फिल्म की शूटिंग शुरू करेंगे. इसकी औपचारिक घोषणा जल्द होगी. कार्तिक ने फैसला किया है कि अब वह विज्ञापन फिल्में भी करेंगे. हाल में, उन्होंने एक कमर्शियल की शूटिंग भी की है. कार्तिक कहते हैं, मैंने सोच लिया है कि नई-नई संभावनाएं तलाश करूंगा. खुद को किसी दायरे में सीमित नहीं रखूंगा. मगर एक्टिंग हमेशा मेरी प्राथमिकता रहेगी. मेरी कोशिश रहती है कि मैं एक्टिंग हमेशा करता रहूं. जब मैं फिल्म नहीं करता हूं, तो एक ट्यूटर ढूंढ़ लेता हूं, जो मुझे कुछ नया सिखाए. मैं जिम छोड़ सकता हूं, डांस करना छोड़ सकता हूं, लेकिन एक्टिंग कभी नहीं. इस वक्त आपके सामने भी मैं एक्टिंग ही कर रहा हूं (हंसते हैं). 


इनके साथ काम करने का इच्छुक हूं...
अनुराग कश्यप
इम्तियाज अली
विकास बहल

Friday, March 21, 2014

अंकिता के साथ जिंदगी बीतना चाहता हूं- सुशांत सिंह राजपूत

सुशांत सिंह राजपूत के जीवन में टर्निंग पॉइंट रहा. काय पो चे और शुद्ध देसी रोमांस की कामयाबी ने उन्हें एक हॉट फिल्म स्टार बना दिया. रघुवेन्द्र सिंह ने की उनसे एक खास भेंट
सुशांत सिंह राजपूत के आस-पास की दुनिया तेजी से बदली है. इस साल के आरंभ तक उनकी पहचान एक टीवी एक्टर की थी, लेकिन अब वह हिंदी सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित और लोकप्रिय फिल्म निर्माण कंपनी यशराज के हीरो बन चुके हैं. शुद्ध देसी रोमांस के बाद वह अपनी अगली दोनों फिल्में ब्योमकेष बख्शी और पानी इसी बैनर के साथ कर रहे हैं. उन पर आरोप है कि आदित्य चोपड़ा का साथ पाने के बाद उन्होंने अपने पहले निर्देशक अभिषेक कपूर (काय पो चे) से दोस्ती खत्म कर ली. डेट की समस्या बताकर वह उनकी फिल्म फितूर से अलग हो गए. 
हमारी मुलाकात सुशांत सिंह राजपूत के साथ यशराज के दफ्तर में हुई. काय पो चे और शुद्ध देसी रोमांस की कामयाबी को वह जज्ब कर चुके हैं. वैसे तो इस हॉट स्टार के दिलो-दिमाग को केवल उनकी गर्लफ्रेंड अंकिता लोखंडे ही बखूबी समझती हैं. औरों के सामने वह बड़ी मुश्किल से अपना हाल-ए-दिल बयां करते हैं. लेकिन हम इस मुश्किल काम को करने की कोशिश कर रहे हैं. आप खुद जज कीजिए की इस बातचीत में आप सुशांत को कितना बेहतर जान पाए...

माना जाता है कि यशराज का हीरो बनने के बाद बाजार और दर्शकों का नजरिया आपके प्रति बदल जाता है. क्या वाकई ऐसा होता है?
जब मैं हीरो नहीं भी बनना चाहता था, जब मैं फिल्में देखा करता था, तब मैं यह सोचता था कि यार, यशराज का हीरो बन जाएं, तो क्या बात होगी. ये तो आप समझ ही सकते हैं कि आज मैं कितना अच्छा फील कर रहा हूं. दूसरा, जब मैंने एक्टर बनने के बारे में सोचा, तो मैंने यह तय नहीं किया कि एक दिन मैं टीवी करूंगा, फिर फिल्म करूंगा और एक दिन मैं इनके साथ काम करूंगा, एक दिन उनके साथ काम करूंगा. मेरे दिल में केवल यह बात थी कि एक्टिंग करने में मुझे मजा आता है. तो इसे मुझे बहुत अच्छे से करना और सीखना है. जब मैं थिएटर में कोई प्ले करता था, तो इतना ही एक्साइटेड होता था, मैं इतनी मेहनत और अच्छे से काम करता था. और जब लोग आकर मेरा प्ले देखते थे और तालियां बजाते थे, तो मुझे बहुत अच्छा लगता था. उतना ही अच्छा लगता है, जब आज मेरी दो फिल्में हिट हो चुकी हैं. तो ये तुलना मैं कर ही नहीं सकता कि इसका हीरो, उसका हीरो, टीवी एक्टर बनने के बाद मुझे कैसा लग रहा है. मुझे छह साल से ऐसा ही लग रहा है.

इस बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता है, क्योंकि कुछ अचीव करने के बाद इंसान अलग महसूस करता है.
बहुत से लोगों को यकीन नहीं होता, लेकिन ये आपको लगता है न कि एक दिन मैं ये अचीव करूंगा और जब मैं उसे अचीव कर लूंगा, तो मुझे अच्छा लगेगा. लेकिन अगर आपने ऐसा कोई लक्ष्य बनाया ही नहीं है कि मैं एक दिन ये करूंगा, फिर वो करूंगा. मुझे भी नहीं पता कि मुझे जो फिल्में आज मिल रही हैं, वो क्यों मिल रही हैं. जो फिल्में मैं कर चुका हूं और जो आगे कर रहा हूं. वो सारी ऐसी स्क्रिप्ट्स हैं, जिनका हिस्सा मैं बनना चाहता हूं, इसलिए मैं इतना एक्साइटेड हूं. मैं इसीलिए इतना एक्साइटेड हूं कि मैं अगली फिल्म में दिबाकर बनर्जी के साथ काम कर रहा हूं. वो इतने इंटेलीजेंट हैं, इतने अलग तरीके का सिनेमा बनाते हैं, तो उनके साथ मुझे काम करने का मौका मिला. मैं इसलिए एक्साइटेड नहीं हूं कि मैं एक और फिल्म कर रहा हूं और अब टीवी एवं थिएटर नहीं कर रहा हूं. एक्साइटमेंट के अलग-अलग कारण हैं और सेंस ऑफ अचीवमेंट के अलग कारण हैं. आज मैं पांच फिल्में साइन कर लूं और तब मुझे लगेगा कि मैं अच्छा एक्टर हूं. मुझे अपने बारे में नहीं पता. अगर आज मैं एक ही फिल्म कर रहा हूं या थिएटर में मैं एक ऐसा प्ले करूं, जिसे लगता है कि मैं नहीं कर सकता, तो मुझे अच्छा लगेगा.

दिबाकर बनर्जी की फिल्म ब्योमकेश बख्शी के लिए आपको किस तरह की तैयारी की जरूरत पड़ रही है?
मैं हर फिल्म की रिलीज के बाद दो से ढ़ाई महीने का गैप लेता हूं. ताकि अपने अगले किरदार के बारे में हर चीज पढ़ सकूं, समझ सकूं, उसका बैकग्राउंड पता करूं, ताकि जब मैं शूट करने जाऊं, तो मुझे यह कंफ्यूजन न हो कि यार, मैं यह कैरेक्टर नहीं हूं. ब्योमकेश बख्शी हमारे पहले फिक्शनल डिटेक्टिव हैं, जिनकी बत्तीस-तैंतीस स्टोरीज ऑलरेडी हैं, तो ब्योमकेश का नाम लेते ही आपके दिमाग में उसकी एक इमेज बन जाती है. सबने उसे अपने-अपने तरीके से प्रजेंट किया है, तो जब आप उस किरदार के बारे में सोचते हैं, जब स्क्रिप्ट पढ़ते हैं, तो आप महसूस करते हैं कि डायरेक्टर कुछ अलग ही बताने की कोशिश कर रहा है, तो आपने जितना भी होमवर्क किया, वह आप पहले दिन भूल गए. फिर आप तय करते हैं कि चलिए देखते हैं कि क्या होता है.

शुद्ध देसी रोमांस जब आपने साइन की, तो यह खुशी सबसे पहले किसके संग शेयर की थी?
मैंने अंकिता से शेयर किया था. वो बहुत खुश थीं. अंकिता ने सेलिब्रेट किया था. यशराज की फिल्म मिलना और तब मिलना, जब आपकी पहली फिल्म रिलीज न हुई हो और दूसरा, आपने ऑडिशन के जरिए पाई हो. आप पहले ही एक बैगेज के साथ आते हैं कि आप एक टीवी एक्टर हैं. आपको खुद नहीं पता होता है कि टीवी में एक्टिंग करके आपने क्या गलत कर दिया जिंदगी में. और आपसे बोला जाता है कि पिछले बीस साल में तो ऐसा कोई नहीं कर पाया है, तो तुम क्या करोगे? आप समझते हैं कि वो भी सही बोल रहे हैं.

शुद्ध देसी रोमांस में आपने किसिंग सीन किया है. अंकिता को इस पर आपत्ति नहीं थी?
हम सब प्रोफेशनल एक्टर हैं और यह आपके काम का हिस्सा है. जब आप एक्टिंग कर रहे होते हैं, तो एक्टिंग कर रहे होते हैं. आप झूठ नहीं बोल रहे होते हैं. आप उस समय उस किरदार को फील कर रहे होते हैं. वह कर रहे होते हैं, जो वह करता है. इस फिल्म में दिखाना था कि दो किरदारों के बीच इस लेवल की इंटीमेसी है. हम क्या करते हैं कि हमें पर्दे पर यह सब नहीं देखना है. अगर आप आंकड़े उठाकर देखेंगे, तो पिछले बीस साल में सबसे ज्यादा जनसंख्या हमारे देश की बढ़ी है. सबसे ज्यादा बच्चे हमारे हुए हैं. लेकिन हम बात नहीं करेंगे भाई और ना ही टीवी पर दिखाएंगे. अगर आप एक रियलिस्टिक फिल्म में काम करते हैं, तो यह दिखाना पड़ेगा.

अंकिता आपको लेकर पजेसिव रहती हैं. क्या आप भी उन्हें लेकर पजेसिव हैं?
देखिए हम लोग चाहे कुछ भी बोल लें, लेकिन साइकॉलोजिकली हम सब इनसिक्योर्ड हैं. हम लोगों को एक चीज चाहिए होती है- सिक्योरिटी. वह हमें कभी लगता है कि जॉब से आ सकती है, तो हम हर वह काम करते हैं, जो वह जॉब बचाने में मदद करे. कुछ लोगों को लगता है कि किसी रिश्ते से आ सकती है, तो हम उसको पकडक़र रखते हैं. लेकिन साइकॉलोजिकल सिक्योरिटी मिलती नहीं है. यह ह्यïूमन नेचर है. कभी मेरे काम के बीच में अंकिता का पजेसिव नेचर नहीं आता. दूसरी बात कि अगर वह मेरे लिए पजेसिव न हों, तो मेरे लिए चिंता की बात होगी कि अरे यार, ये कैसी लडक़ी है कि मेरे लिए पजेसिव नहीं है. पजेसिव तो होना ही चाहिए. अगर मुझे मेरा काम पसंद है, तो मैं इसे लेकर पजेसिव हूं. अगर यह हाथ से चला गया, तो मेरा क्या होगा. अंकिता के साथ मैं इसलिए हूं या इसलिए जिंदगी बीतना चाहता हूं, क्योंकि वो मुझे अच्छी तरह से जानती और समझती हैं. वह मुझे साइकॉलोजिकली सिक्योर लगती हैं. इसलिए मैं पजेसिव हूं.

आपके हिसाब से परिनीती चोपड़ा और वाणी कपूर में से कौन बेटर एक्टर है?
दोनों में तुलना नहीं होनी चाहिए. दो इंसान, जिनका बैकग्राउंड फिल्म का नहीं है, वह यशराज की फिल्म कर रही हैं, मनीष शर्मा डायरेक्ट कर रहे हैं, तो उनमें कोई तो बात होगी. परिनीती बहुत कॉन्फिडेंट और स्पॉनटेनियस हैं. जब आप उनके साथ एक्ट कर रहे होते हैं, तो आपको इतना पता होता है कि अगर आप बीच में इंप्रॉवाइज भी करेंगे, तो वह उसी पर रिएक्ट करेंगी. वह उस लेवल तक तैयार रहती हैं. परिनीती के साथ एक्शन-रिएक्शन पर खेलते हैं. वाणी की बात करें, तो उनकी बिल्कुल ही फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं है. थिएटर नहीं किया, टीवी नहीं किया है. जब मैं पहली बार टीवी में काम करने गया था, तो मुझसे लाइन नहीं बोली जा रही थी. कैमरा सामने रखा था, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. मुझे लगा कि वाणी के साथ भी ऐसी प्रॉब्लम होगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उन्हें सारी लाइनें याद थीं. वह घबराई नहीं. ये चीजें मुझमें नहीं हैं. मैंने बहुत मेहनत की, तब जाकर आज इस तरह की स्पॉनटेनिटी लाने की कोशिश कर पाता हूं.

आदित्य चोपड़ा के साथ पहली मीटिंग याद है?
बिल्कुल याद है. उसे कौन भूल सकता है. जब मैं उनसे मिलने गया, तो शुरू में कुछ समय तक मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. मैं उन्हें सिर्फ देख रहा था. ऐसे पल में, आप खुद को यह समझा रहे होते हैं कि यह सब सच में हो रहा है. फिर धीरे-धीरे आवाज सुनाई पडऩे लगती है. उन्होंने शुद्ध देसी रोमांस के बारे में कहा. उन्होंने मेरा काम देखा है पहले और उनको लगता है कि मैं एक अच्छा एक्टर हूं. लेकिन उन्होंने कहा कि अंतिम फैसला राइटर जयदीप वर्मा और डायरेक्टर मनीष शर्मा लेंगे. आपको ऑडिशन देना पड़ेगा. मेरे लिए इतना ही बहुत था.

आपको आदित्य चोपड़ा कैसे इंसान लगे? उनके व्यक्तित्व को आप कैसे परिभाषित करेंगे?
वह बहुत अच्छे फिल्ममेकर हैं. उन्हें पता है कि वह क्या कर रहे हैं. उनके दिमाग में क्लैरिटी है कि उन्हें क्या काम चाहिए. वह समझते हैं कि कौन कितना काबिल है और क्या कर सकता है. और अगर कोई अपने आपको काबिल समझता है और उसकी पोटेंशियल ज्यादा है, तो उसको रियलाइज करवाना कि तुम्हारी पोटेंशियल इसलिए ज्यादा है और ये करो, तो और भी ज्यादा हो जाएगा. इतना सपोर्टिव हैं. आप दूर की देख सकते हैं. आप वो चीजें सोच सकते हैं, जिसकी आम तौर पर लोग कल्पना भी नहीं कर पाते उस समय में.

क्या यह कह सकते हैं कि टीवी में आपकी मार्गदर्शक एकता कपूर थीं और अब फिल्म में आदित्य चोपड़ा हैं?
देखिए, हर बात घूम-फिर कर यहां आ जाती है कि आप कैमरे के सामने क्या करते हैं. अगर मैंने कैमरे के सामने अच्छी एक्टिंग करना बंद कर दी, तो फिर कोई भी आपको काम नहीं देगा. चाहे वह आपका मेंटर हो या कोई भी हो. मैं बहुत लकी हूं कि मैं इनके साथ काम कर रहा हूं. लेकिन वहीं, कल इस चीज को मैं हल्के से लेने लगूंगा कि चलो, ये लोग मुझे बैक कर रहे हैं, तो मैं बैठकर रिलैक्स करने लगूं, तो ऐसे काम नहीं चल सकता.

क्या आज आदित्य चोपड़ा के साथ आपके ऐसे संबंध हैं कि आप फोन उठाकर उनसे राय ले सकते हैं?
जी हां, बिल्कुल. उन्होंने खुद कहा है कि यशराज की फिल्म हो या बाहर की फिल्म, सारा डिसीजन तुम्हारा होगा. अगर तुम मुझसे पूछना चाहते हो कि सर, क्या करना चाहिए, तो वह तुम मुझसे कभी भी पूछ सकते हो. लेकिन मैं तुम्हें कभी नहीं कहूंगा कि ऐसा करो या ऐसा मत करो. मैं उनसे राय लेता हूं.

फराह खान की फिल्म हैप्पी न्यू ईयर में अंकिता काम करने वाली थीं, लेकिन अब वो उसका हिस्सा नहीं हैं. क्या वजह रही?
बातें चल रही थीं. बहुत सी चीजें थीं, जो वर्कआउट नहीं हो सकीं. काय पो चे से लेकर अब तक मेरे साथ पच्चीस फिल्मों की बातें चलीं, लेकिन चीजें वर्कआउट हुई नहीं. तो बातें होती रहती हैं.

मैं शोशेबाजी पसंद नहीं करता- शिव पंडित

शिव पंडित ने ठान लिया है कि अब वह केवल लार्जर देन लाइफ फिल्में ही करेंगे. इसकी वजह वह रघुवेन्द्र सिंह को बता रहे हैं
थिएटर, विज्ञापन और टीवी के टेढ़े-मेढ़े गलियारों से होकर शिव पंडित फिल्मों तक पहुंचे हैं. पहला मौका उन्हें शैतान (2011) में मिला. इस फिल्म में प्रभावशाली अभिनय की बदौलत उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में बेस्ड डेब्यू पुरस्कार के लिए नामांकन मिला. इतनी चर्चा के बावजूद शिव ने हड़बड़ी नहीं दिखाई और उन्हें उनके धैर्य का फल भी मिला. अक्षय कुमार ने अपने प्रोडक्शन हाउस में उनके साथ तीन फिल्मों का अनुबंध साइन किया. इसमें से पहली फिल्म बॉस पिछले दिनों प्रदर्शित हुई. अक्षय कुमार के छोटे भाई के किरदार में वह सबका ध्यान खींचने में सफल रहे. अब शिव का खुश होना स्वाभाविक है, ''बॉस में काम करने का मेरा मकसद था कि मेरा काम केवल पच्चीस लोगों तक नहीं, बल्कि पंद्रह हजार लोगों तक पहुंचे. लोगों ने मुझसे पूछा था कि शैतान के बाद आपने 180 डिग्री का टर्न कैसे ले लिया? आपको शैतान जैसी एक-दो और फिल्में करनी चाहिए थीं. लेकिन मुझे लगता है कि कमर्शियल फिल्में एक कलाकार को देश के कोने-कोने के दर्शकों तक पहुंचाने का माद्दा रखती हैं." शिव ने तय कर लिया है कि भविष्य में वह इसी किस्म की फिल्में करेंगे.
नागपुर में पले-बढ़े शिव का अभिनय में आना मानो तय था. बचपन में उनकी मम्मी (टीना) ने उन्हें एक समर वर्कशॉप में डाला. वहां फ्रॉगी प्रिंस नाटक में वह कभी मेंढक़, तो कभी पेड़ बने. कई मंचन के बाद उन्हें आखिरकार प्रिंस की केंद्रीय भूमिका निभाने के लिए दी गई. उनका मन इस काम में लगने लगा. फिर अपनी ट्रांसफरेबल सरकारी नौकरी की वजह से उनके डैड (गिरीश शर्मा) ने उनका एडमिशन दून स्कूल (देहरादून) में करवा दिया. वहां वह हर रविवार फिल्म देखने निकल लेते थे. हीरो नंबर वन, करण-अर्जुन और मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी जैसी फिल्में देखने में उनका खूब मन लगता था. ग्रेजुएशन के लिए वह हिंदू कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) पहुंचे, तो वहां भी थिएटर की गतिविधियों में सक्रिय रहे. और जब रेडियो मिर्ची से नौकरी का ऑफर मिला, तो वह 2003 में मुंबई आ पहुंचे. उसके बाद जिंदगी उन्हें एक के बाद एक सरप्राइज देती रही. ''एक दिन मुझे एड के लिए फोन आया. पहले मैं झिझका, लेकिन फिर दोस्त के कहने पर ऑडिशन के लिए गया. टाइड सर्फ के लिए पहली बार कैमरा फेस किया. मुझे मजा आया. लगा कि यही काम करना चाहिए. मैं ऑडिशन देने जाने लगा. मैंने दो शॉर्ट फिल्में द प्राइवेट लाइफ ऑफ अल्बर्ट पिंटो और द अदर वूमन कीं. फिर एक दिन एफआईआर शो के ऑडिशन के लिए फोन आया. मैं टीवी सीरियल नहीं करना चाहता था. लेकिन जब शो का कॉन्सेप्ट सुना, तो राजी हो गया. इसी प्रकार एक दिन शैतान के ऑडिशन का फोन आया था." शिव अपने शुरुआती सफर को याद करते हैं.
शिव आज उस गलैमर वल्र्ड का हिस्सा हैं, जहां माना जाता है कि अधिकतर लोग नकली होते हैं. शिव खुद इस बात से इत्तेफाक रखते हैं, ''इस इंडस्ट्री में बहुत सारे रिश्ते नकली हैं." मगर शिव ने इस दुनिया का रंग अपने ऊपर चढऩे नहीं दिया है. इस मुलाकात के लिए वह शॉर्ट्स, टी-शर्ट और चप्पल पहनकर आए हैं. वह कहते हैं, ''मैं जेनुइन हूं. मैं शोशेबाजी करना पसंद नहीं करता. एक्टिंग हमारा काम है. यह बात दिमाग में हमेशा रखनी चाहिए." शिव खुश हैं कि इस अतरंगी दुनिया में उन्होंने कुछ असली रिश्ते कमाए हैं. उसके बारे में वह बताते हैं, ''अक्षय सर से मेरा दोस्ती का रिश्ता असली है. आज मैं मन की हर बात उनसे कह देता हूं. उनसे सलाह लेता हूं. वह खुद रीयल हैं और नकली लोगों को पसंद नहीं करते. मैं उनसे खुद को रिलेट कर पाता हूं." तीन भाई-बहन में शिव सबसे बड़े हैं. उनकी बहन गायत्री भी फिल्मों से जुड़ी हैं. वह बॉस में असिस्टेंट निर्देशक थीं. मगर शिव कहते हैं, ''गायत्री मुझे देखकर फिल्मों में आई है. वह देसी बॉयज में भी असिस्टेंट डायरेक्टर थी. लेकिन बॉस के सेट पर शुरु में किसी को पता नहीं था कि वह मेरी बहन हैं. मैं जरा भी सेट पर देर से पहुंचता था, तो मेरी सबसे ज्यादा शिकायत वही करती थी." शिव और गायत्री मुंबई में अलग-अलग रहते हैं. उसकी वजह वह बताते हैं, ''उसे लगता है कि मैं उसे पका दूंगा. वह इंडिपेंडेंट है." शिव चलते-चलते इस संभावना से इंकार नहीं करते कि भविष्य में भाई-बहन की जोड़ी किसी फिल्म में साथ आ सकती है.

नवाजुद्दीन की औकात क्या है? ऋषि कपूर

कमर्शियल सिनेमा का कोई मजाक उड़ाए, यह ऋषि कपूर को बर्दाश्त नहीं. रघुवेन्द्र सिंह से एक बातचीत में वह अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख सके
हिंदी फिल्मों में उम्र के साथ चरित्र बदल जाते हैं. जवानी में हीरो की भूमिका निभाने वाले स्टार भी एक समय के बाद छिटक कर साइड में चले जाते हैं, लेकिन अमिताभ बच्चन के बाद अब ऋषि कपूर ने इस परिपाटी को तोड़ा है. उन्होंने सहयोगी भूमिकाओं को अपने लिए अयोगय साबित किया है और एक बार फिर से बड़े पर्दे पर केंद्र में आ गए हैं. 2010 में हबीब फैजल की फिल्म दो दूनी चार में पत्नी नीतू कपूर के साथ मिलकर ऋषि ने बॉक्स-ऑफिस पर ऐसा धमाल मचाया कि निर्माता-निर्देशक फिर से उनके दरवाजे पर खड़े होने लगे. ऋषि कपूर खुशी के साथ कहते हैं, ''दो दूनी चार के बाद मेरे लिए चीजें बदल गईं. अब मैं कैरेक्टर एक्टर नहीं रहा. मैं ऐसे रोल अब लेता ही नहीं हूं. मेरे रोल मेन लीड के बराबर होते हैं." 
इस वक्त हम ऋषि कपूर के साथ सुभाष घई की फिल्म कांची के सेट पर हैं. तैंतीस साल के बाद कर्ज की यह सुपरहिट जोड़ी इसमें साथ लौट रही है. ऋषि एक भव्य गाने की शूटिंग करने जा आए हैं. फिलहाल, उनके मन में कई भावनाएं उमड़ रही हैं. उनके मन में अपने बेटे की कामयाबी की खुशी है, तो कमर्शियल सिनेमा का माखौल उड़ाने वाले लोगों के प्रति बहुत गुस्सा है. हम बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाते हैं...

आजकल आप एक ओर डी-डे जैसी गंभीर फिल्म कर रहे हैं, तो  दूसरी ओर शुद्ध देसी रोमांस और कांची जैसी हल्की-फुल्की मनोरंजक मिजाज की फिल्में. अब आप ज्यादा एक्सपेरिमेंट मोड में दिख रहे हैं?
एक एक्टर का यही तो काम है ना! मुझे एक्टर का खिताब चाहिए. पहले ऐसे चांस नहीं मिलते थे. अभी चांस मिला है, तो मैंने अपने आपसे प्रॉमिज किया है कि मुझे सभी तरह के किरदार करने हैं. लुक हर फिल्म में अलग होना चाहिए. निगेटिव हो, पॉजिटिव हो, कॉमिक हो, ट्रैजिक हो, कुछ भी हो. मुझमें सब कुछ करने की योग्यता होनी चाहिए. मैं अब कैरेक्टर एक्टर नहीं रहा हूं. मैं फिल्म का सेकेंड हीरो होता हूं और मेरा रोल मेन लीड के बराबर होता है. आप देख लो कि हर पिक्चर में मैं कितने वेरायटी के कैरेक्टर अब कर रहा हूं.

सुभाष घई और आपकी जोड़ी ने कर्ज में इतना धमाल मचाया था. इसके बावजूद दोबारा साथ आने में तैंतीस साल क्यों लग गए?
वो तो सुभाष जानें. तैंतीस साल बाद हम साथ काम कर रहे हैं. मैं सत्ताइस साल का था, जब उन्होंने मेरे साथ ओम शांति ओम गाना शूट किया था. आज मैं 61 साल का हूं और इस तरह का गाना मेरे साथ कर रहे हैं (हंसते हैं). आपको यह दोनों फोटोग्राफ्स एक साथ पाठकों को दिखानी चाहिए.

आपको सेट पर डांस करते हुए देखकर हमें बहुत अच्छा लग रहा है.
मुझे तो बहुत अजीब लग रहा है. मैं 61 साल का हूं. आज भी मैं डांस कर रहा हूं. मैंने सोचा कि साउथ में सभी हीरो एनटीआर, एमजीआर सब सोलह साल की लड़कियों श्रीदेवी से प्यार करते थे. मुझे श्रीदेवी आकर बोलती थी कि सर, मैं एनटीआर, कृष्णा के साथ डांस करती थी, जो मेरी उम्र से डबल के होते थे. आज मैं इस गाने में हेजेल के साथ डांस कर रहा हूं, जो मेरी आधी उम्र की है. मैं इसे सम्मान की तरह देखता हूं. ईश्वर की कृपा रही है हम पर कि उसने ऐसा वक्त भी हमको दिखाया है. लेकिन मैं अपने काम को एंजॉय करता हूं. ये मत सोचना कि मैं काम मजबूरी में कर रहा हूं.

सुभाष घई के साथ इतने साल बाद काम कर रहे है. उनमें क्या बदलाव आए हैं?
उनका पैशन सेम है. बाल थोड़े सफेद हो गए हैं. मेरे बाल भी सफेद हो गए हैं. प्यार और सम्मान हमारा एक-दूसरे के लिए सेम है. पैशन, प्यार और लगन आज भी वही है. वक्त बदल गया है. लेकिन हमारा पैशन सिनेमा के लिए एक ही है. देखिए, अभी मैं यहां से एक दूसरी फिल्म की शूटिंग में जा रहा हूं. दस बजेंगे रात के. लेकिन मजा आ रहा है. ईश्वर कितने लोगों को ऐसा मौका देता है. मैं अपने फैंस को खुश कर पा रहा हूं, यह मेरे लिए बड़ी बात है.

कांची में अपने रोल के बारे में बताएं?
यह सुभाष घई टाइप एक निगेटिव कैरेक्टर है. उनका होता है ना ओवर द टॉप, कॉमेडी-रोमांटिक. इसमें उन्होंने मुझे थोड़ा अलग किस्म का रोल दिया है. यह विजय माल्या से प्रेरित किरदार है. मेरा पूरा गेटअप उन्हीं से लिया गया है. स्टाइलाइज भी वैसे ही किया है. लेकिन यह उनके जीवन की कहानी नहीं है.

क्या आपको अपने किरदारों के लिए तैयारी की जरूरत पड़ती है?
नहीं, हिंदी फिल्मों में ऐसा नहीं होता है. जो लोग रिसर्च की बात करते है, उनको मेरी तरफ से एक झापड़ खींचकर देना. अंडे से बाहर निकले दो दिन होते नहीं है कि अपने आपको एक्टर बोलते हैं और रिसर्च-विचर्स की बात करते हैं. आजकल के नए एक्टर अपने आपको तीस मार खां समझते हैं. उनसे पूछना कि क्या रिचर्स करते हो तुम लोग? और अगर तुमने किया है, तो क्या उखाड़ा है? कमर्शियल सिनेमा में तो आओ. पर्दे पर पहले धंधा करके तो दिखाओ. बातें करते हैं. इन पर मुझे बहुत गुस्सा आता है. बेसिकली हम सब कमर्शियल एक्टर्स हैं. हम सब एंटरटेनर्स हैं. वी प्रोवाइड एंटरटेनमेंट. वी ब्लडी डोंट प्रोवाइड एनी काइंड ऑफ नॉनसेंस. चालीस साल से मैं वही कर रहा हूं, ईश्वर की कृपा से और वही करना चाहता हूं.

आज भी आप दर्शकों को सरप्राइज कर रहे हैं. यह बड़ी बात है.
वह एक एक्टर का ट्रिक होना चाहिए- सरप्राइज द ऑडियंस. वरना आप बासी हो जाओगे. मैंने 25 साल अपनी जिंदगी में वही काम किया. केवल रोमांटिक हीरो के रोल. आगे देखो, मैं क्या क्या करता हूं. तब मिलते नहीं थे ऐसे कैरेक्टर्स. बनती नहीं थीं ऐसी पिक्चरें. हमको कोई देता नहीं था. आज ऐसा मौका मिल रहा है.

रणबीर भी आपकी तरह सबको सरप्राइज करते रहते हैं. क्या आप दोनों ने मिलकर प्लानिंग की है?
बिल्कुल नहीं. दुनिया जानती है कि मैं उसके क्रिएटिव पहलू में इंटरफीयर नहीं करता. यह एक संयोग भर है.

रणबीर की उड़ान से खुश हैं?
देखो, उसकी मेहनत है बेचारे की. एक बार में एक पिक्चर करता है बस. वो भी देखो रिस्क कितना बड़ा लेता है. अगर वह पिक्चर नहीं चले, तो उसके हाथ से काम जा सकता है. लोग कहेंगे कि अरे यार छोड़ो. इतना गट्स होना चाहिए आपमें. आप एक बर्फी! कर रहे हो और आपने तीन पिक्चरों को ना बोला. वो भी एक राजकुमार हिरानी की पिक्चर, एक रोहित शेïट्टी की और एक अभिनव की. किस एक्टर में इतना दम है यार... मैं इस इंडस्ट्री के बिगेस्ट स्टार की बात भी कर रहा हूं. किसी एक्टर में इतना दम नहीं है कि वह एक्सपेरिमेंटल फिल्म करे. मैं अपनी बात भी कर रहा हूं. कोई सोचे तो सही कि चलो एक हटकर पिक्चर करते हैं, मेरे फैंस को अच्छा लगेगा. वो भी नहीं करते, क्योंकि उनके लिए पैसा महत्वपूर्ण है.

क्या आप रणबीर की चॉइसेस से खुश हैं?
नहीं. उस वक्त तो खुश नहीं था, जब उसने यह सब करना शुरू किया था. सब कहते थे कि क्या हो गया है तेरे बेटे को? मैं भी सोचता था कि क्या हो गया है. आज उसने सबको चुप करवा दिया है. पहले जब सरदार (रॉकेट सिंह सेल्समैन ऑफ द ईयर) बनकर घूमता था, फिर बाल बढ़ाकर रॉकस्टार कर रहा था, फिर गूंगे-बहरे का रोल कर रहा था, तो लोगों को कसीदे कसने में और कमेंट पास करने में तो कुछ जाता नहीं है ना. मुझे भी बुरा महसूस होता था कि यार, मेरा बेटा क्या कर रहा है. आज रणबीर ने सबको बोल दिया है कि शट अप. जस्ट कीप क्वाइट. मैं वही करूंगा, जो मैं करना चाहता हूं.

उस दौरान क्या आप रणबीर को बोलते थे कि ऐसा मत करो?
नहीं, मैंने कभी नहीं बोला. मैंने उसे उसका स्पेस दिया. आज उसने कमर्शियल जोन में आकर ये जवानी है दीवानी करके अपने आपको प्रूव कर दिया है. बर्फी! जैसी पिक्चर ने सौ करोड़ का बिजनेस किया. यह एक बड़ी अचीवमेंट है. ईश्वर की उस पर कृपा रही है. बस, अपना काम मेहनत से करते रहो, हमने अपने बुजुर्गों से यही सीखा है. मैं अपने बच्चे से यही बोलता हूं कि जैसे काम कर रहे हो, वैसे ही करो, लगन से करो.

क्या आरके बैनर फिर से सक्रिय हो रहा है?
आरके के बारे में मेरे से बात मत करो. आरके मेरे हिसाब से बंद हो चुका है. कोई पिक्चर उसमें बनने वाली नहीं है. सब झूठ बोलते हैं कि उसमें पिक्चर बनने वाली है.

क्या आप दोबारा डायरेक्शन में लौटेंगे?
मेरे पास बिल्कुल समय नहीं है. मैं डायरेक्टर गलती से बन गया था. मैं बेसिकली एक एक्टर हूं. फिल्ममेकिंग मेरा पैशन नहीं है.

नए कलाकारों में आपको किसका काम अच्छा लगता है?
मुझे इरफान खान बहुत अच्छे लगते हैं. बहुत अच्छे इंसान भी हैं. वह फाइन एक्टर हैं. अर्जुन रामपाल ने भी बहुत इंप्रूव किया है. मेरे हिसाब से सुशांत सिंह राजपूत, आयुष्मान खुराना और अर्जुन कपूर अच्छा काम करते हैं. मैं उन्हीं के बारे में बोल सकता हूं, जिनके साथ काम किया है.

किस निर्देशक का काम आपको पसंद है?
अनुराग कश्यप की फिल्म देखी है गैग्स ऑफ वासेपुर. अच्छी लगी थी. थोड़ी स्लो और लंबी थी. उनकी और कोई पिक्चर नहीं देखी. सुना है कि वह अच्छी पिक्चरें बनाते हैं.

 नवाजुद्दीन पर भड़के ऋषि कपूर 
"मैंने कहीं पढ़ा कि नवाजुद्दीन (सिद्दिकी) नाम के कोई एक्टर हैं, उन्होंने कुछ उल्टा-सीधा कहा है कि रोमांटिक हीरोज रनिंग अराउंड द ट्रीज. उनके बाप-दादा भी नहीं कर सकते हैं ऐसा काम. वो खुद तो क्या करेंगे. इट्स वेरी डिफिकल्ट टू ब्लडी सिंग सॉन्ग्स एंड रोमांस द ब्लडी डैम हीरोइन. डोंट थिंक्स इट्स ईजी. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ऐसा कहने की? तुम्हारी औकात क्या है कि तुम किसी में इंसपिरेशन डालो. तुम हो कौन यार? तुम कमेंट क्या पास करते हो कि व्हाट इज ग्रेट अबाउट डूइंग दैट? आपको पता है कि यह करने में क्या हुनर चाहिए होता है? कभी शाहरुख खान से पूछना, सलमान से पूछना, कभी अक्षय कुमार से पूछना, कभी जितेन्द्र से पूछना, राजेश खन्ना तो रहे नहीं. बच्चन साब से पूछना... गाना गाना या रोमांस करना आसान काम नहीं है हिंदी फिल्मों में. मेरे दोस्त, मेरे अजीज, मेरे जूनियर नवाजुद्दीन शाह (सिद्दिकी) को यह पता नहीं. और उनको ऐसी गलत बात बिल्कुल नहीं बोलनी चाहिए. इट्स टेक्स लॉट ऑफ आर्ट, इट टेक्स लॉट ऑफ टैलेंट टू डू दिस. मैं आपके टैलेंट को धुत्कार नहीं रहा हूं. मैंने सुना है कि आप बहुत अच्छे एक्टर हैं. एकाद पिक्चरें आपकी देखी भी हैं, जिसमें आप बहुत एवरेज थे. लेकिन दूसरे जो करते हैं, उसमें बहुत मेहनत लगती है. आपने जिंदगी में वह कभी किया नहीं है और आपको कभी मौका भी नहीं मिलेगा. आप कर भी नहीं सकते. आपकी इमेज नहीं है. आपमें वह टैलेंट नहीं है."

साभार: फ़िल्मफ़ेयर

Friday, March 14, 2014

ऑन द सेट्स- टोटल सियापा

अली जफर, यामी गौतम और किरण खेर ने टोटल सियापा फिल्म के सेट पर जमकर सियापा मचाया. रघुवेन्द्र सिंह उनके सियापे के बारे में बता रहे हैं
निर्माता- नीरज पांडे
निर्देशक- ईश्वर निवास
कलाकार- अली जफर, यामी गौतम, किरण खेर, अनुपम खेर
संगीत-गीत- अली जफर
कोरियोग्राफर- गणेश आचार्य
लोकेशन- फिल्मसिटी, मुंबई


कहानी
यह फिल्म पाकिस्तानी रॉकस्टार अमन (अली जफर) की कहानी है, जिसे एक पंजाबी लडक़ी आशा (यामी गौतम) से प्यार हो जाता है. दोनों शादी करने का फैसला करते हैं. आशा अपने पैरेंट्स से मिलवाने के लिए अमन को घर ले आती है. परिजनों को अमन बहुत पसंद आता है, लेकिन जैसे ही उन्हें पता चलता है कि वह पाकिस्तानी है, तो घर में हंगामा मच जाता है. टोटल सियापा एक स्पैनिश फिल्म ओनली ह्यूमन (2004) का आधिकारिक रिमेक है.

क्या सीन है
अली जफर, यामी गौतम और किरण खेर के साथ ईश्वर निवास अपनी फिल्म टोटल सियापा का प्रमोशनल म्यूजिक विडियो टोटल सियापा है तेरा प्यार... शूट कर रहे हैं. इसे लिखा है अली जफर ने. उन्होंने ही इसका संगीत तैयार किया है और आवाज भी दी है.
डांस बेबी डांस
पिछली रात दो बजे तक अली जफर ने अपनी फिल्म तेरे बिन लादेन 2 की शूटिंग की और आज सुबह-सुबह वह टोटल सियापा फिल्म के सेट पर हाजिर हैं. पूरी ऊर्जा के साथ वह अपनी को-स्टार यामी गौतम के साथ रंग-बिरंगे जगमगाते सेट पर डांस स्टेप्स की रिहर्सल कर रहे हैं. गणेश आचार्य दोनों को दिशा-निर्देश दे रहे हैं और ईश्वर निवास मॉनीटर के सामने फ्रेम पर नजर रखे हुए हैं. दरअसल, एक गाने की शूटिंग के दौरान निर्देशक की भूमिका गौण हो जाती है. कोरियोग्राफर के हाथ में निर्देशन का जिम्मा आ जाता है. गणेश माइक संभालते हैं और एक्शन बोलते हैं. दो सौ किलो आंसू, ढाई सौ किलो गम... टोटल सियापा है तेरा प्यार... गीत बजता है और अली-यामी थिरकना शुरू करते हैं. दोनों की केमिस्ट्री लाजवाब है. गणेश को मनमाफिक शॉट तुरंत मिल जाता है. वह खुशी के साथ कहते हैं, ''अली के साथ मैंने चश्मे बद्दूर में काम किया था. उन्हें पता है कि मैं क्या चाहता हूं. वह थोड़े शर्मीले हंै, लेकिन अच्छा डांस कर लेते हैं. यामी के साथ मैं पहली बार काम कर रहा हूं. वह अच्छी डांसर हैं. दोनों के संग मैंने चार-पांच दिन रिहर्सल किया था. एक्चुअली, अली ने बहुत अच्छा गाना कंपोज किया है. जब गाना अच्छा हो, तो डांस करने में मजा आता है." 
केमिस्ट्री कमाल की
यामी अपना सोलो शॉट देने के लिए कैमरे के सामने रूकती हैं और अली मॉनीटर के पास आ जाते हैं. वह आवाज बदलकर यामी-यामी चिल्लाते हैं और उनकी हौसलाअफजाई करते हैं. यामी समझ जाती हैं कि यह शैतानी कौन कर रहा है! वह हंस पड़ती हैं. हम अली से मुखातिब होते हैं. वह कहते हैं, ''पिछले छह महीने कैसे गुजरे हैं, ये न पूछें." दरअसल, गत छह महीनों में अली ने टोटल सियापा और तेरे बिन लादेन 2 के गाने लिखे व कंपोज किए. यामी के बारे में अली बताते हैं, ''बड़ा मजा आया यामी के साथ काम करके. रोजाना आपको दस घंटे किसी को बर्दाश्त करना आसान नहीं होता. इट्स लाइक ए मैरिज विदाउट फिजिकल रिलेशनशिप." यह बात यामी सुन लेती हैं और वह हंसने लगती हैं. ड्राय फ्रूट्स से भरा अपना डिब्बा उठाते हुए यामी पूछती हैं कि मेरे वॉलनट्स कहां गए? मस्ती के अंदाज में अली पूछते हैं, ''कौन से नट्स? खुदा की कसम मैंने नहीं खाए यार..." और वह अपनी हंसी रोक नहीं पाते. कुछ पल बाद हंसी पर नियंत्रण करते हुए अली ने कहा, ''यामी अच्छी इंसान हैं. इनके लिए दिल से इज्जत निकलती है और कोई इमोशन नहीं निकलता है." यह सुनकर यामी खुश हो जाती हैं, ''यह जेनुइन तारीफ है. आएम टच्ड." तभी अली अगली लाइन बोलते हैं, ''लेकिन यामी का ïवाइल्ड साइड किसी ने नहीं देखी है. शायद इन्होंने खुद भी नहीं देखी होगी." यामी पलटकर जवाब देती हैं, ''जिसके लिए होगी, उन्होंने देख ली होगी या देख लेंगे." यामी-अली की इस केमिस्ट्री ने हमें हंसा-हंसाकर लोट-पोट कर दिया. सोचिए, फिल्म में दोनों ने मिलकर क्या धमाल मचाया होगा!
किरण का ऑब्जेक्शन
अली और यामी को कुछ समय पश्चात किरण खेर जॉइन करती हैं. वह फिल्म में यामी की मां का किरदार प्ले कर रही हैं. अपने साथ वह एक अलग प्रकार की एनर्जी लाती हैं. अली-यामी उनकी कंपनी को एंजॉय करते हैं. गणेश आचार्य शॉट लेना शुरू करते हैं. इस शॉट में अली, किरण और यामी के दादाजी, भाई व बहन का किरदार निभाने वाले कलाकार भी मौजूद हैं. कलाकारों के बीच सही को-ऑर्डिनेशन न हो पाने के कारण गणेश को सही शॉट नहीं मिल पा रहा है. एक बार तो किरण खेर के कान में बंदूक की नोंक से ठोकर लग जाती है और वह खुद पर नियंत्रण नहीं रख पातीं. आठवें टेक में गणेश खुश नजर आते हैं. सभी कलाकार मॉनीटर के पास बैठकर चैन की सांस लेते हैं. अली का असिस्टेंट फ्रूट्स का डिब्बा लाकर उन्हें देता है. यह देखकर किरण खेर कहती हैं कि आजकल के लडक़े अपने डायट को लेकर कितने कॉन्शस रहते हैं. पराठे-वराठे कोई खाता ही नहीं है. वह सिक्स पैक एब्स ट्रेंड की खिलाफत करते हुए कहती हैं, ''लड़कियां ऐसे लडक़ों को थोड़े ही पसंद करती हैं, जो दिन-रात अपनी बॉडी देखते रहते हैं. पूरे दिन शूटिंग करने के बाद रात को नौ बजे जिम भागते हैं." यामी उनकी बात से सहमति जताती हैं. उनकी बात इत्मिनान से सुनने के बाद अली कहते हैं, ''मैंने पिछली रात तेरे बिन लादेन 2 के लिए इसी विषय पर एक गाना शूट किया. बहुत मजेदार कॉन्सेप्ट है. आप सबको पसंद आएगा." गणेश कलाकारों से स्टेज पर आने का आग्रह करते हैं. वह अगला शॉट लेने के लिए अब तैयार हैं. वह हमें बताते हैं कि रात के दस बजे तक शूटिंग चलेगी. हम डांस, मस्ती, धमाल और सियापे से भरे इस माहौल से विदा लेते हैं.



''मैं राजमा-चावल स्वादिष्ट बनाता हूं"- सुशांत सिंह राजपूत

एक्टिंग में निपुण सुशांत सिंह राजपूत किचन की कला भी जानते हैं. रघुवेन्द्र सिंह ने इस हॉट स्टार के फूड लव और कुकिंग के शौक के बारे में जाना
कॉफी है कमजोरी
सुशांत सिंह राजपूत को सुबह बिस्तर से निकलते ही सबसे पहले गरमा-गरम कॉफी की तलब होती है. कॉफी उनकी कमजोरी है. ''बिल्कुल. सुबह-सुबह मुझे सबसे पहले ब्लैक कॉफी चाहिए होती है. यह मेरी फेवरेट है. मैं कॉफी बहुत पीता हूं. जब मैं सेट पर होता हूं, तो सात-आठ कप कॉफी पी जाता हूं." बताते हैं सुशांत.

फूडी हूं मैं
सुशांत एक ऐसे पेश में हैं, जहां उनका खान-पान उस किरदार पर निर्भर करता है, जो उस समय वह निभा रहे होते हैं. वरना उन्हें अलग-अलग डिशेज आजमाने में बहुत मजा आता है. वह कहते हैं, ''मैं फूडी हूं, लेकिन अगर मैं एक ऐसा किरदार प्ले करने जा रहा हूं, जिसके लिए मुझे वजन कम करना हो, तो मैं खाने पर कंट्रोल करुंगा. अगर ऐसी स्थिति नहीं है, तब मेरे सामने जलेबी-समोसा भी रखा हो, तो मैं उस पर टूट पड़ता हूं."

समोसे... नहीं
सुशांत जब तक पवित्र रिश्ता में काम करते रहे, तब तक उन्हें कभी वजन घटाने या बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ी. मगर जैसे ही उन्होंने अपनी पहली फिल्मकाय पो चे साइन की, उन्हें अपना डायट चार्ट बदलना पड़ा. सुशांत बताते हैं, ''जब मैं टीवी में काम कर रहा था, तब मैं 89 किलो था. मगर ईशान के किरदार के लिए मुझे चौदह किलो वजन घटाना पड़ा. मैंने छह-सात हफ्ते में अपना वजन 74 किलो किया." आजकल भी सुशांत स्ट्रिक्ट डायट पर हैं. उसकी वजह का खुलासा वह करते हैं, ''अभी मैं 78 किलो का हूं. दिबाकर बनर्जी की फिल्म ब्योमकेश बख्शी के लिए मुझे पांच-छह किलो वजन कम करना है. इसलिए इस वक्त अगर आप मुझे समोसे देंगे, तो मैं चाहकर भी नहीं खा पाऊंगा. लेकिन अगर मुझे अपने डायट की ऐसी-तैसी करनी हो, तो मैं मटन बिरयानी और जलेबी रबड़ी फौरन ऑर्डर करूंगा."

दिल्ली का खाना... वाह!
सुशांत ने जीवन के कई साल दिल्ली में गुजारे हैं, इसलिए उन्हें दिल्ली के खाने के बारे में गहराई से जानकारी है. फूड के मामले में वह दिल्ली को मुंबई से बेहतर आंकते हैं. बकौल सुशांत, ''मुझे दिल्ली का खाना बहुत अच्छा लगता है. मेरे खयाल से स्पाइस जो होता है, वह तरीके से बनता है. यूं कह सकते हैं कि दिल्ली का खाना दिल से बनता है. मूलचंद के परांठे और कमला नगर के मोमोज पॉइंट के मोमोज दूसरी किसी जगह नहीं मिल सकते. जब मैं दिल्ली में था, तब इन जगहों पर दोस्तों के साथ बहुत जाता था." मुंबई में सुशांत जब अंकिता के साथ आउटिंग पर निकलते हैं, तो वह जिन जगहों पर जाते हैं, उनके बारे में बताते हैं, ''अगर चाइनीज खाने का मन होता है, तो हम मेनलैंड चाइना जाते हैं. वरना इंडिगो. अगर बहुत पैसे आ गए और कुछ समझ में नहीं आता, तो जेडब्ल्यू मैरिएट जैसे फाइव स्टार होटल में चले जाते है." डिपेंड करता है कि किस रीजन से खाना चाहते है."

कुकिंग एक्सपर्ट!
अगर आप यह सोच रहे हैं कि यह हॉट स्टार किचन में नहीं जाता, तो आप गलत हैं. अपने नैचुरल, दमदार और प्रभावशाली अभिनय से लोगों के दिलों में बसे सुशांत को कुकिंग की कला भी आती है. यह अलहदा बात है कि अपनी अति व्यस्त दिनचर्या की वजह से वह कभी-कभार ही किचन में जा पाते हैं. लेकिन जब वह किचन में जाते हैं, ''तब मैं अक्सर इंडियन फूड बनाता हूं. मैं अपनी फेवरेट डिश राजमा-चावल बहुत स्वादिष्ट बनाता हूं. जब घर में कोई न हो और मुझे खुद को खुश करना हो, तो मैं राजमा-चावल बना लेता हूं." अपनी लेडी लव अंकिता का दिल जीतने के लिए भी सुशांत कभी-कभी कुकिंग करते हैं. ''अंकिता फूडी नहीं हैं, इसलिए उन्हें सब कुछ चलता है. उन्हें प्यार से जो भी परोसते हैं, वो खा लेती हैं." और सुशांत के लिए अंकिता क्या खास तौर से पकाती हैं? जवाब में यह स्टार मुस्कुराते हुए बताते हैं, ''अंकिता मेरे लिए कभी-कभी गाजर का हलवा बनाती हैं. मुझे गाजर का हलवा बहुत पसंद है." स्वीट्स सुशांत की कमजोरी हैं. ''आप मुझे चॉकलेट ऑफर करें या पेस्ट्री या फिर कोई भी मीठा, मैं तुरंत फिसल जाता हूं." वह हंसते हुए यह सीक्रेट बता देते हैं.

पार्टी सीक्रेट्स
बहुत कम लोगों ने एक स्टार को पार्टी में खाना खाते हुए देखा होगा. तो क्या स्टार पार्टियों में घर से खाना खाकर जाते हैं? इसका जवाब सुशांत ने ठहाके के साथ दिया, ''देखिए, डिपेंड करता है कि किसकी पार्टी है, कहां है और कितनी देर वहां मुझे रुकना है." उन्होंने अपना सीक्रेट बताया, ''अगर मैं अपने दोस्त की पार्टी में जा रहा हूं और मुझको पता है कि वहां खाना अच्छा है, तब मैं घर से बिना खाए निकलता हूं. लेकिन अगर मैं श्योर नहीं हूं कि मैं कितनी देर पार्टी में रुकूंगा, तो घर से खाकर पार्टी में जाता हूं."

स्टार होने का फायदा
एक स्टार जब किसी रेस्टोरेंट में प्रवेश करता है, तो उसे हमेशा स्पेशल ट्रीटमेंट मिलती है. सुशांत के पास ऐसे काफी अनुभव हैं, ''जब मैं संडे को किसी रेस्टोरेंट में खाने जाता हूं, तो पहले ही फोन करके बोल देता हूं कि मैं आ रहा हूं. तो वो लोग मेरे लिए एक टेबल रख देते हैं. कभी-कभी तो मुझसे पैसे भी नहीं लेते हैं." रेस्टोरेंट में आजकल कस्टमर को मिनरल और रेज्युलर वॉटर का विकल्प दिया जाता है. इनमें से सुशांत किसे चुनते हैं? वह हैरानी के साथ कहते हैं, ''मैं मिनरल वॉटर ही बोलता हूं, लेकिन मैंने आज तक सोचा नहीं कि मैं मिनरल क्यों बोलता हूं. उनका रेज्युलर वॉटर भी तो स्वच्छ होता है."

फेवरेट डिश
राजमा-चावल
गाजर का हलवा


मुंबई की फेवरेट रेस्टोरेंट/होटल
मेनलैंड चाइना
इंडिगो
जेडब्ल्यू मैरिएट

दिल्ली के फेवरेट फूड जॉइंट्स
मूलचंद के परांठे
मोमोज पॉइंट (कमला नगर)
साभार: फिल्मफेयर